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Top Current Affairs of the day: 3 September 2020

Table of Contents

विषय: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य- सरकार के मंत्रालय एवं विभाग, प्रभावक समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।


‘नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय’


(International Covenant on Civil and Political Rights- ICCPR)


चर्चा का कारण


हाल ही में, अंतर्राष्ट्रीय विधिवेत्ता आयोग (International Commission of Jurists– ICJ) ने कहा है; कि नागरिक अधिकार अधिवक्ता प्रशांत भूषण को भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा आपराधिक अवमानना   के लिए दी गई सजा, ‘नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय’ (International Covenant on Civil and Political Rights- ICCPR) द्वारा गारंटीकृत ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ कानून असंगत प्रतीत होती है। भारत, ICCPR पर हस्ताक्षरकर्ता देश है।


अंतर्राष्ट्रीय विधिवेत्ता आयोग (ICJ) क्या है?


अंतर्राष्ट्रीय विधिवेत्ता आयोग (International Commission of Jurists- ICJ) एक अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार गैर-सरकारी संगठन है।


संरचना: यह 60 प्रख्यात न्यायविदों का एक संगठन है, जिसमें वरिष्ठ न्यायाधीश, वकील और शिक्षाविद सम्मिलि हैं।


कार्य: विधि के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार मानदंडो को विकसित करना।


मुख्यालय: जिनेवा, स्विट्जरलैंड।


प्रशांत भूषण के मामले पर ICJ का व्यक्तव्य


    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा वकीलों की भूमिका पर अंतरराष्ट्रीय मानदंडो के अनुसार सजा असंगत प्रतीत होती है।

    इस निर्णय से “भारत में संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रयोग पर एक भयावह प्रभाव” पड़ने का जोखिम लिया गया है।

    यद्यपि, अंतरराष्ट्रीय मानदंडो द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ प्रतिबंधों की अनुमति दी जाती है, फिर भी न्यायपालिका की भूमिका, न्याय तक पहुंच और लोकतंत्र, जनता द्वारा अदालतों पर सार्वजनिक टिप्पणी सहित, इस तरह के मामलों पर बहस और चर्चा के लिए जगह संरक्षित की जानी चाहिए।


‘नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय’ (ICCPR) क्या है?


यह संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) द्वारा अपनाई गई एक बहुपक्षीय संधि है।


    संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति द्वारा ICCPR कार्यान्वयन की निगरानी की जाती है।

    यह संधि, सभी सदस्य देशों को व्यक्तियों के नागरिक और राजनीतिक अधिकारों का सम्मान करने तथा जीवन का अधिकार, धर्म, वाक्, एवं सम्मलेन की स्वतंत्रता, चुनावी अधिकार तथा निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध करती है।

    ICCPR, अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार अभिसमय (International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights- ICESCR) तथा मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (Universal Declaration of Human Rights- UDHR) को संयुक्त रूप में ‘अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार विधेयक’ (International Bill of Human Rights) के रूप में माना जाता है।

    यह संधि वर्ष 1976 में प्रभावी हुई थी। भारत सहित कुल 173 देशों ने इस संधि के नियमों की अभिपुष्टि की है।


प्रीलिम्स लिंक:


    अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार विधेयक क्या है?

    मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) क्या है?

    संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति के बारे में

    ICCPR कब प्रभावी हुआ?

    क्या भारत ने ICCPR पर हस्ताक्षर किए हैं?

    ICCPR का अनुच्छेद 21

    अंतर्राष्ट्रीय विधिवेत्ता आयोग (ICJ)


मेंस लिंक:


किसी भी सार्वजानिक अथवा निजी स्थान पर, खुले स्थल पर अथवा किसी भवन के अंदर, या ऑनलाइन, किसी खुशी को मनाने अथवा विरोध प्रदर्शन के लिए, शांतिपूर्वक सम्मलेन करना, एक ‘मूलभूत मानव अधिकार’ है। वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए।


विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।


आत्महत्याओं तथा दुर्घटनावश हुई मौतों पर NCRB की रिपोर्ट


संदर्भ:


हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा आत्महत्याओं तथा दुर्घटनावश हुई मौतों पर एक रिपोर्ट जारी की गई है।


इस रिपोर्ट से पता चलता है कि देश भर में, पिछले वर्ष 2018 के आंकड़ों की तुलना में आत्महत्याओं तथा दुर्घटनावश हुई मौतों की संख्या में वृद्धि हुई है।


देश में आत्महत्याओं पर रिपोर्ट:


    देश में आत्महत्याओं की संख्या 1,34,516 से बढ़कर 1,39,123 हो गईं है।

    कुल आत्महत्याओं में से पुरुषों द्वारा की गयी आत्महत्याएं 97,613 थी, जिनमे से सर्वाधिक आत्महत्याएं (29,092) दैनिक वेतन भोगी पुरुषों द्वारा की गयीं, इसके बाद स्व-नियोजित (14,319) और बेरोजगार (11,599) व्यक्तियों ने आत्महत्या की।

    आत्महत्या करने वाली कुल 41,493 महिलाओं में से आधी से अधिक गृहणियां थीं।

    बेरोजगार व्यक्तियों द्वारा सबसे ज्यादा आत्महत्याएं केरल में 14% (1,963), इसके बाद महाराष्ट्र में 10.8%, तमिलनाडु में 9.8%, कर्नाटक में 9.2% और ओडिशा में 6.1% की गयी।

    व्यावसायिक गतिविधियों में लगे हुए व्यक्तियों में से सर्वाधिक आत्महत्याएं महाराष्ट्र (14.2%), तमिलनाडु (11.7%), कर्नाटक (9.7%), पश्चिम बंगाल (8.2%) और मध्य प्रदेश (7.8%) में हुईं।

    शहरों में आत्महत्या की दर (13.9%) अखिल भारतीय औसत की तुलना में अधिक थी।

    सामूहिक / पारिवारिक आत्महत्या के सर्वाधिक मामले तमिलनाडु (16) से दर्ज किये गए, इसके बाद आंध्र प्रदेश (14), केरल (11) और पंजाब (9) और राजस्थान (7) का स्थान रहा।


दुर्घटनावश हुई मौतों पर रिपोर्ट:


    देश में दुर्घटनावश हुई मौतों की संख्या में 2.3% की वृद्धि हुई है। वर्ष 2018 के दौरान दुर्घटनावश हुई मौतों की संख्या 4,11,824 थी जो कि बढ़कर 4,21,104 हो गयी है।

    दुर्घटनावश हुई मौतों की संख्या दर (प्रति लाख जनसंख्या) 31.1 से बढ़कर 31.5 हो गई है।

    30-45 आयु वर्ग में सर्वाधिक व्यक्ति (30.9%) हताहत हुए हैं, उसके बाद 18-30 आयु वर्ग (26%) का स्थान रहा।

    महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा दुर्घटनावश मौतें (70,329) दर्ज की गईं, जो कुल आंकड़े का लगभग छठा हिस्सा हैं।

    प्राकृतिक आपादाओं के कारण होने वाली कुल 8,145 मौतों में से 35.3% बिजली गिरने के कारण, 15.6% गर्मी/सन स्ट्रोक से तथा 11.6% मौतें बाढ़ के कारण हुईं हैं।

    बिजली गिरने से सबसे ज्यादा मौतें (400) बिहार और मध्य प्रदेश में हुईं, इसके बाद झारखंड (334) और उत्तर प्रदेश (321) की मौतें हुई।

    दुर्घटनावश मौतों के प्रमुख कारण ‘यातायात दुर्घटनाएँ’ (43.9%), आकस्मिक मौतें’ (11.5%), ‘डूबने से’ (7.9%), ‘ज़हर’ (5.1%), ‘गिरने से’ (5.1%) और ‘आकस्मिक आग'(2.6%) थे। सर्वाधिक मौतें (57.2%) 18-45 वर्ष के आयु वर्ग में हुई।


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के बारे में:


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Record Bureau- NCRB) की स्थापना वर्ष 1986 में अपराध और अपराधियों पर सूचना भंडार के रूप में कार्य करने तथा अपराधियों के अपराध साबित करने में जांचकर्ताओं की सहायता के लिए की गयी थी।


    NCRB को राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977-1981) तथा गृह मंत्रालय की टास्क फोर्स (1985) की सिफारिशों के आधार पर गठित किया गया था।

    NCRB देश भर में होने वाले अपराधों के वार्षिक आंकड़े पेश करता है (‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट)।

    वर्ष 1953 से प्रकाशित होने वाली यह रिपोर्ट देश भर में कानून और व्यवस्था की स्थिति को समझने में एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करती है।


प्रीलिम्स लिंक:


    NCRB- स्थापना और कार्य।

    ‘भारत में अपराध’ रिपोर्ट किसके द्वारा जारी की जाती है?

    आकस्मिक मौतों और आत्महत्याओं पर हालिया रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएं।


मेंस लिंक:


NCRB द्वारा प्रकाशित हालिया रिपोर्ट के आधार पर भारत में आत्महत्या दर पर प्रकाश डालिए तथा इसे कम करने के तरीके सुझाएं।


विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।


समायोजित सकल राजस्व (AGR)

(Adjusted gross revenue)
चर्चा का कारण
हाल ही में, उच्चतम न्यायालय द्वारा दूरसंचार कंपनियों को सरकार के लिए समायोजित सकल राजस्व (AGR) देय राशि का भुगतान करने हेतु 10 वर्ष का समय दिया गया है।
विवाद का विषय
AGR विवाद पर अदालत द्वारा अक्टूबर 2019 में दिए गए फैसले में दूरसंचार कंपनियों को मूल रूप से तीन महीने में समायोजित सकल राजस्व (AGR) का भुगतान करना था। न्यायालय का मानना था कि, निजी दूरसंचार क्षेत्र द्वारा केंद्र की उदारीकरण नीतियों के तहत राजस्व साझाकरण व्यवस्था के अंतर्गत काफी लंबे समय तक लाभ उठाया गया है।
    बाद में, सरकार ने दूरसंचार कंपनियों को बकाया राशि का भुगतान करने के लिए एक 20-वर्षीय ‘फार्मूला’ अदालत में प्रस्तावित किया था। लेकिन, अदालत ने इसे खारिज कर दिया और कहा, कि बकाया भुगतान के लिए 20 साल की अवधि बहुत अधिक है।
    दूरसंचार कंपनियों द्वारा आंशिक भुगतान किये जाने के बाद भी, अभी भी 1.43 लाख करोड़ बकाया है।
समायोजित सकल राजस्व (AGR) क्या होती है?
समायोजित सकल राजस्व (AGR), दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा दूरसंचार ऑपरेटरों से लिया जाने वाले उपयोग तथा लाइसेंस शुल्क है। इसे आवंटित स्पेक्ट्रम के उपयोग शुल्क तथा लाइसेंस शुल्क में विभाजित किया जाता है, जोकि क्रमशः 3-5 प्रतिशत और 8 प्रतिशत के बीच होता है।
इसकी गणना किस प्रकार की जाती है?
दूरसंचार विभाग के अनुसार, AGR की गणना में दूरसंचार कंपनियों द्वारा अर्जित कुल राजस्व के आधार पर की जाती है- जिसमें गैर-दूरसंचार स्रोतों जैसे जमाराशियों पर ब्याज तथा परिसंपत्तियों की बिक्री से प्राप्त होने वाली आय भी सम्मिलित होती है।
AGR से संबंधित विवाद
राष्ट्रीय दूरसंचार नीति, 1994 के अंतर्गत दूरसंचार क्षेत्र में उदारीकारण किया गया था, जिसके तहत एक निश्चित लाइसेंस शुल्क के बदले में कंपनियों को लाइसेंस जारी किए गए थे।
    हालांकि, निश्चित निर्धारित लाइसेंस शुल्क से राहत प्रदान करने के लिए, सरकार द्वारा वर्ष 1999 में लाइसेंस धारकों को राजस्व साझाकरण मॉडल अपनाने का विकल्प दिया गया।
    इसके तहत, मोबाइल टेलीफोन ऑपरेटरों को वार्षिक लाइसेंस शुल्क (license fee– LF) तथा स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क (Spectrum Usage Charges– SUC) के रूप में सरकार के साथ अपने AGR का कुछ प्रतिशत साझा करना होता था। दूरसंचार विभाग (DoT) और दूरसंचार कंपनियों के मध्य लाइसेंस समझौते होने के बाद में सकल राजस्व को परिभाषित किया जाना था।
    दूरसंचार विभाग (DoT) और दूरसंचार कंपनियों के मध्य विवाद मुख्य रूप से AGR की परिभाषा पर था।
    दूरसंचार विभाग के अनुसार, AGR में दूरसंचार तथा गैर-दूरसंचार सेवाओं से अर्जित सकल राजस्व (छूट से पहले) को सम्मिलित किया जाता है। दूसरी ओर, टेलीकॉम कंपनियाँ मात्र दूरसंचार सेवाओं से होने वाली आय वाली आय पर AGR की गणना पर जोर देती हैं।
प्रीलिम्स लिंक:
    समायोजित सकल राजस्व (AGR) क्या है? इसकी गणना कैसे की जाती है?
    इस विवाद पर उच्चत्तम नयायालय का क्या फैसला था?
    TRAI की संरचना?
    भारत में स्पेक्ट्रम का आवंटन कैसे किया जाता है?
मेंस लिंक:
वर्तमान में भारतीय दूरसंचार क्षेत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। टेलीकॉम सेक्टर को बचाने के लिए भारत सरकार को क्या करना चाहिए?
विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।
क़तर के श्रम कानूनों में सुधार
(Qatari labor laws reforms)
संदर्भ:
हाल ही में क़तर (Qatar) द्वारा श्रम कानूनों में परिवर्तन किये गए हैं। अक्टूबर 2019 में क़तर के अमीर द्वारा इन सुधारों की घोषणा की गयी थी।
श्रम कानूनों में किये गए ये सुधार सभी राष्ट्रीयताओं तथा सभी क्षेत्रों के श्रमिकों पर लागू होंगे। नए श्रम कानून नियमों में घरेलू कामगारों को सम्मिलित किया गया है, इससे पहले इन्हें श्रम कानून से बाहर रखा गया था।
क़तर के नए श्रम कानून क्या हैं?
    नए क़ानून के तहत, प्रवासी श्रमिकों को नौकरी बदलने से पहले अपने नियोक्ताओं से ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ की आवश्यकता तथा अन्यायपूर्ण कफाला सिस्टम (Kafala system) को समाप्त कर दिया गया है।
    अब, किसी नियोक्ता के पास दो वर्ष से कम अवधि तक काम करने वाले श्रमिकों को नौकरी छोड़ने से एक महीने पूर्व नोटिस देना होगा तथा यदि किसी नियोक्ता के पास दो वर्ष से अधिक समय से काम कर रहा है, तो उसे दो महीने पहले नोटिस देना होगा।
    न्यूनतम वेतन में 25 प्रतिशत की वृद्धि कर $ 274 अथवा 1000 कतरी रियाल (QAR) किया गया है, तथा कंपनी द्वारा आवास और भोजन नहीं दिए जाने पर इनके लिए क्रमशः 500 QAR तथा 300 QAR अतिरिक्त दिए जायेंगे।
पृष्ठभूमि:
क़तर को वर्ष 2022 फीफा विश्व कप की मेजबानी का अवसर मिला है। इसके बाद से क़तर ने व्यापक रूप से श्रम सुधारों की शुरुआत की है। विश्वकप आयोजन हेतु विशाल निर्माण कार्यक्रम का आरंभ किया गया है, जिसमे बड़ी संख्या में विदेशी श्रमिकों को नियुक्त किया जायेगा।
कफाला सिस्टम क्या है?
कफाला सिस्टम (Kafala system), एक पद्धति है, जिसमे विदेशी ‘मेहमानों’ की देखभाल तथा सुरक्षा संबंधी दायित्वों का निर्धारण किया गया है। कफाला का अरबी में अर्थ होता है ‘गारंटी देना’ या ‘ध्यान रखना’।
    इस प्रणाली के तहत, एक प्रवासी श्रमिक की आव्रजन स्थिति अनुबंध अवधि के दौरान कानूनी तौर पर एक व्यक्तिगत नियोक्ता (‘कफील’) के अधीन होती है।
    प्रवासी, कफील से स्पष्ट लिखित अनुमति प्राप्त किए बिना किसी भी कारण से देश में प्रवेश नहीं कर सकता है, न ही रोजगार हस्तांतरित कर सकता है और न ही देश छोड़ सकता है।
कफाला प्रणाली कब शुरू हुई?
कफाला प्रणाली की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी, जब मध्य पूर्व के देशों में तेल की खोज होने के बाद विकास में तेजी लाने के लिए विदेशी श्रमिकों को काम पर रखना शुरू कर दिया।
कफाला प्रणाली कहाँ प्रचलित है?
कफाला प्रणाली, खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य देशों बहरीन, कुवैत, ओमान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात में प्रचलित है, इसके अलावा जॉर्डन और लेबनान में भी इसका उपयोग किया जा रहा है।
कफाला प्रणाली को क्यों समाप्त किया जाना चाहिए?
    मानवाधिकार समूहों के अनुसार इस प्रवासन प्रबंधन प्रणाली के तहत शोषण और बलात श्रम को बढ़ावा दिया जाता है, तथा इसमें श्रमिक स्वेच्छा से काम नहीं करता बल्कि इससे बलात और दंड के भय से काम कराया जाता है।
    मीडिया ने कफाला प्रणाली के तहत रोजगार की स्थितियों की तुलना “आधुनिक-दासता” से की है।
    कई प्रवासी श्रमिक अपने नियोक्ताओं की प्रताड़ना से बचने के लिए फरार हो जाते हैं तथा कहीं और शरण लेने के लिए विवश हो जाते हैं। खाड़ी राज्यों में, फरार होना एक अपराध माना जाता है और इसके दंडस्वरूप अनिश्चितकालीन नजरबंद तथा निर्वासित कर दिया जाता है।
    किसी प्रकार की शिकायत करने से प्रवासी श्रमिकों को अपने प्रायोजक की नाराजगी का सामना करना पड़ता है, जिसके पास इनका निवास वीजा रद्द करने और निर्वासित करने की शक्ति होती है।
    कफाला प्रणाली श्रम कानूनों का प्रत्यक्षतः उल्लंघन करती है। इसके तहत नियोक्ता, भर्ती प्रक्रिया और कामकाजी परिस्थितियों को मनचाहे तरीके से निर्धारित कर सकते है।
    यह श्रमिक गतिशीलता को प्रतिबंधित करती है। इसमें कफील की अनुमति के बिना श्रमिक कहीं भी जा सकता है। यदि कफील अनुमति नहीं देता है, तो श्रमिक बेहतर रोजगार के लिए उसकी नौकरी नहीं छोड़ सकते हैं।
प्रीलिम्स लिंक:
    क़तर की भौगोलिक स्थिति।
    क़तर द्वारा हालिया श्रम कानून में सुधार।
    कफाला प्रणाली क्या है?
    कफाला प्रणाली कहाँ प्रचलित है?
मेंस लिंक:
कफाला श्रम प्रणाली क्या है? हाल ही में कतर ने इस प्रणाली को समाप्त कर दिया। इस निर्णय के महत्व पर चर्चा कीजिए।
विषय: समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय।
इंडेक्स-लिंक्ड इंश्योरेंस प्रोडक्ट
(Index-Linked Insurance Products– ILIP)
संदर्भ:
हाल ही में, भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) द्वारा जीवन बीमा खंड में ‘इंडेक्स-लिंक्ड इंश्योरेंस प्रोडक्ट’ (Index Linked Insurance Products– ILIP) के विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए इंडेक्स-लिंक्ड प्रोडक्ट (ILP) पर एक कार्य समूह का गठन किया है।
वर्तमान IRDAI उत्पाद नियमों के तहत, बीमा कंपनियों को विशेष रूप से इंडेक्स-लिंक्ड उत्पादों को बेचने की अनुमति नहीं है।
पृष्ठभूमि:
कुछ समय पूर्व, जीवन बीमाकर्ताओं द्वारा ‘इंडेक्स-लिंक्ड इंश्योरेंस प्रोडक्ट’ (Index Linked Insurance Products– ILIP) की बिक्री करने हेतु भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) से अनुमति मागीं गयी थी। वर्तमान में, जीवन बीमा कंपनियां दो उत्पाद श्रेणियां ऑफर करती हैं – यूनिट-लिंक्ड बीमा योजनाएं तथा पारंपरिक योजनाएं।
‘इंडेक्स-लिंक्ड इंश्योरेंस प्रोडक्ट’ (ILP) क्या होते हैं?
    ‘इंडेक्स-लिंक्ड इंश्योरेंस प्रोडक्ट’ वे बीमा उत्पाद होते हैं, जिनके रिटर्न बेंचमार्क सूचकांक से जुड़े होते हैं। ये उत्पाद 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड या सेंसेक्स अथवा निफ्टी जैसे इक्विटी इंडेक्स से जुड़े होते हैं।
    इस प्रकार के बीमा उत्पाद पॉलिसीधारक को एक गारंटीकृत मूल्य प्राप्त करने की सहूलियत प्रदान करते हैं।
प्रीलिम्स लिंक:
    इंडेक्स लिंक्ड इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स (ILIP) के बारे में
    ये यूनिट-लिंक्ड बीमा योजनाओं और पारंपरिक योजनाओं से किस प्रकार भिन्न हैं?
    ILIP के लाभ
    IRDAI- रचना और कार्य
मेंस लिंक:
इंडेक्स लिंक्ड इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स के महत्व पर चर्चा कीजिए।
विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
ग्रीन टर्म अहेड मार्केट (GTAM)
संदर्भ:
हाल ही में सरकार द्वारा, भारतीय अल्पकालिक बिजली बाजार को हरित बनाने के लिए पहले कदम के रूप में पूरे देश के लिए विद्युत क्षेत्र में ग्रीन टर्म अहेड मार्केट (Green Term Ahead Market– GTAM) की शुरुआत की गयी है।
GTAM क्या है?
यह एक नया वैकल्पिक मॉडल है, जिसे अक्षय ऊर्जा डेवलपर्स द्वारा दीर्घकालिक सार्वजनिक-निजी भागीदारी में शामिल हुए बगैर खुले बाजार में नवीकरणीय ऊर्जा बेचने के लिए लागू किया गया है।
GTAM की प्रमुख विशेषताएं:
    जीटीएएम के माध्यम से लेन-देन द्विपक्षीय होगा, जिसमें खरीदार और विक्रेता की स्पष्ट पहचान होगी, इससे नवीकरणीय खरीद दायित्व (Renewable Purchase Obligations– RPO) के लेखांकन में कोई कठिनाई नहीं होगी।
    जीटीएएम अनुबंधों को सौर RPO और गैर-सौर RPO में अलग किया जाएगा क्योंकि RPO लक्ष्य भी अलग किए गए हैं।
    दैनिक और साप्ताहिक अनुबंध – बोली का कार्य MWh के आधार पर होगा।
    मूल्य की खोज निरंतरता के आधार पर अर्थात मूल्य समय प्राथमिकता के आधार पर की जायेगी। इसके बाद, बाजार की स्थितियों को देखते हुए दैनिक और साप्ताहिक अनुबंधों के लिए खुली नीलामी शुरू की जा सकती है।
    जीटीएएम अनुबंध के माध्यम से निर्धारित ऊर्जा को खरीदार का RPO अनुपालन माना जाएगा।
इस कदम का महत्व और लाभ:
    जीटीएएम प्लेटफॉर्म की शुरूआत नवीकरणीय ऊर्जा-समृद्ध राज्यों पर बोझ कम करेगी और अपने नवीकरणीय खरीद दायित्व (RPO) से नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को और अधिक विकसित करने के लिए उन्हें रियायत देकर प्रोत्साहित करेगी।
    जीटीएएम, नवीकरणीय ऊर्जा कारोबारी क्षमता संवर्धन को बढ़ावा देगा और देश के नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वृद्धि के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करेगा।
    जीटीएएम प्लेटफॉर्म नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में प्रतिभागियों की संख्या में वृद्धि करेगा।
    यह प्रतिस्पर्धी कीमतों तथा पारदर्शी और लचीली खरीद के माध्यम से आरई के खरीदारों को लाभान्वित करेगा।
    पूरे देश के बाज़ार तक पहुंच प्राप्त करने से विक्रेताओं को भी लाभ होगा।
इंस्टा फैक्ट्स:
    भारत सरकार ने 2022 तक नवीकरणीय ऊर्जा में 175 जीडब्लू क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य निधारित किया है।
    पेरिस जलवायु समझौते 2016 के हस्ताक्षरकर्ता के रूप में, भारत वर्ष 2030 तक 40 प्रतिशत अर्थात 450 गीगावॉट नवीकरणीय क्षमता स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
प्रीलिम्स लिंक:
    भारत का अक्षय ऊर्जा लक्ष्य,
    पेरिस जलवायु समझौते के बारे में।
    पेरिस समझौते के तहत भारत की प्रतिबद्धताएं।
    GTAM क्या है? यह किस प्रकार कार्य करता है?
मेंस लिंक:
विद्युत् क्षेत्र में ग्रीन टर्म अहेड मार्केट (GTAM) की शुरुआत के महत्व पर चर्चा कीजिए।
विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980
(National Security Act)
चर्चा का कारण:
हाल ही में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा गोरखपुर के डॉक्टर कफील खान के विरुद्ध पारित किये गए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (National Security Act– NSA) के आदेश को अवैध करार दिया गया तथा उत्तर प्रदेश सरकार को उन्हें जेल से तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने NSA के तहत उनकी हिरासत की अवधि के विस्तार को भी “अवैध” घोषित किया।
पृष्ठभूमि:
दिसंबर 2019 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में नागरिकता संशोधन अधिनियम (Citizenship Amendment Act– CAA) के विरुद्ध एक भाषण के दौरान कथित रूप से भड़काऊ टिप्पणी करने के आरोप में सरकार द्वारा डॉ. कफील खान पर NSA लगा दिया गया था।
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के बारे में:
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) एक कठोर कानून है, जिसका उपयोग केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा निवारक निरोध उपायों के रूप में किया जाता है। इसके तहत, यदि प्राधिकारी को यह संतुष्टि होती है, कि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा या कानून और व्यवस्था के लिए खतरा है, तो उस व्यक्ति को महीनों तक निवारक निरोध में रखा जा सकता है।
    इसके तहत हिरासत की अवधि के दौरान, व्यक्ति पर कोई आरोप लगाने की आवश्यकता नहीं होती है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को अपराध करने से रोकना होता है।
    राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 23 सितंबर 1980 को इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान अस्तित्व में आया था।
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति को निवारक निरोध में लिए जाने के आधार:
    भारत की सुरक्षा पर, भारत के विदेशी सरकारों से संबंधो पर या भारत की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली रीति से कार्य करने से रोकने हेतु किसी व्यक्ति को निरुद्ध किया जा सकता है।
    भारत में किसी भी विदेशी की लगातार उपस्थिति को विनियमित करना अथवा भारत से उसके निष्कासन की व्यवस्था करना।
    राज्य की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली रीति से कार्य करने से या लोक व्यवस्था बनाए रखने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली रीति से कार्य करने से अथवा समुदाय के लिए आवश्यक प्रदायों और सेवाओं को बनाए रखने पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली रीति से कार्य करने से निवारित करने हेतु किसी व्यक्ति को निरुद्ध किया जा सकता है।
समयावधि:
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत, किसी व्यक्ति को बिना किसी आरोप के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है; इसके लिए राज्य सरकार को सूचित करने की आवश्यकता होती है कि NSA के तहत एक व्यक्ति को हिरासत में लिया गया है। इसके तहत, राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित किए बिना कोई भी आदेश 12 दिनों से अधिक समय तक लागू नहीं रहेगा।
    राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उसके खिलाफ आरोपों को बताए बिना 10 दिनों के लिए हिरासत में रखा जा सकता है।
    अपील: हिरासत में लिया गया व्यक्ति उच्च न्यायालय के सलाहकार बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है लेकिन उन्हें मुकदमे के दौरान वकील की अनुमति नहीं होती है।
भारत में निवारक निरोध का इतिहास:
    भारत में निवारक निरोध कानून की शुरुआत औपनिवेशिक युग के बंगाल रेगुलेशन- III, 1818 (Bengal Regulation- III, 1818) से मानी जाती है। इस कानून के तहत सरकार, सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने अथवा सुरक्षा की दृष्टि से किसी भी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रियाओं का मौका दिए बिना गिरफ्तार कर सकती थी।
    एक सदी बाद ब्रिटिश सरकार ने रोलेट एक्ट, 1919 (Rowlatt Acts) को लागू किया, जिसके तहत बिना किसी सुनवाई के संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार करने की अनुमति दी गई।
सलाहकार बोर्डों का गठन:
केंद्र सरकार और प्रत्येक राज्य सरकार, जब भी आवश्यक हो, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक या एक से अधिक सलाहकार बोर्ड का गठन करेगी।
    ऐसे प्रत्येक बोर्ड में तीन व्यक्ति शामिल होंगे, जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किये जाने की योग्यता रखते हों तथा इनकी नियुक्ति उपयुक्त सरकार द्वारा की जायेगी।
    उपयुक्त सरकार, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश को सलाहकार बोर्ड के एक अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेगी। केंद्र शासित प्रदेश के मामले में, सलाहकार बोर्ड में उच्च न्यायालय का न्यायाधीश की नियुक्ति, संबंधित राज्य सरकार द्वारा स्वीकृति दिए जाने के बाद की जायेगी।
इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, प्रत्येक मामले में जहां इस अधिनियम के तहत किसी निरोध आदेश दिया गया है, उपयुक्त सरकार, आदेश के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की तिथि से 3 सप्ताह के भीतर, उसके द्वारा गठित सलाहकार बोर्ड के समक्ष पेश करेगी।
NSA, सामान्य गिरफ्तारी से किस प्रकार भिन्न है?
सामान्य स्थिति में, यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो उसे कुछ मूल अधिकारों की गारंटी दी जाती है।
    इनमें गिरफ्तारी के कारण के बारे में सूचित किए जाने का अधिकार सम्मिलित होता है।
    आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 50 में कहा गया है कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार, और जमानत के अधिकार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।
    आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 56 और 76 के अनुसार– गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर एक व्यक्ति को अदालत में पेश किया जाना आवश्यक है।
    इसके अतिरिक्त, संविधान के अनुच्छेद 22 (1) में कहा गया है कि किसी गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी पसंद के वकील से परामर्श लेने तथा उसके द्वारा बचाव किये जाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।
किंतु, NSA के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को इनमें से कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं होते है।
    किसी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में पांच दिनों तक, तथा असाधारण परिस्थितियों में 10 दिनों तक अंधेरे में रखा जा सकता है।
    गिरफ्तारी का आधार प्रदान करने पर भी, सरकार उन जानकारियों को रोक सकती है, जिन्हें वह सार्वजनिक हित के विरुद्ध मानती है।
    गिरफ्तार व्यक्ति किसी सलाहकार बोर्ड के समक्ष कार्यवाही से जुड़े किसी भी मामले में किसी भी कानूनी व्यवसायी की सहायता का अधिकार नहीं होता है।
प्रीलिम्स लिंक:
    NSA किसके द्वारा लगाया जा सकता है?
    निवारक निरोध के विरुद्ध अपील?
    NSA के तहत गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार
    इस संबंध में संवैधानिक अधिकारों की प्रयोज्यता।
    संविधान के तहत याचिका
मेंस लिंक:
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम क्या है? इसे एक कठोर कानून के रूप में क्यों जाना जाता है? चर्चा कीजिए।

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Akash Dounda

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